कही सुबह न होगी ऐसी
जो सुबह हुई काशी की
वो भी क्या दिन थे
मुर्गे की बांग पे
नीद टूटती थी
दादी उठाती थी
लल्ला जागो
अँधियारा छटा है
सूरज रौशनी लिए आया है
सवेरा हो चला है
मुह धोओ
करो स्नान जाके
अम्मा रोटी बनाती है
जाना है तुम्हे स्कूल
निवाले खाके
: शशिप्रकाश सैनी