नव भाचित्रक
Thursday, July 5, 2012
प्रयाग राज
वो लकीर जो नावों की दिख रही है
वो त्रिवेणी संगम है
पाप धोने आना है
तो निरछल हो जाना है
तब पुण्य कमाना है
: शशिप्रकाश सैनी
Sunday, June 17, 2012
आस्था यहाँ जीवनी है
जब भी यहाँ माथा टिकाते है
ईश्वर को दुःख सुख का साथी बनाते है
जब भी उसके घर आते है
आपकी आस्था चूल्हा हो जाती है
कइयो के घर चलाती है
फूल नारियल चुनरी है
आस्था यहाँ जीवनी है
: शशिप्रकाश सैनी
इच्छाओ के कबूतर
गर आज किसी दिवार पे बैठा
है
दुनिया बदलती देखता है
तो मन
उसका
भी
हज़ार खवाब बुनता है
है कबूतर मन
की मर्ज़ी पे उडाता है
इच्छाए दाना
ये कबूतर मन दाना चुनता है
हज़ार खवाब बुनता है
: शशिप्रकाश सैनी
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